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भद्रा मे होलिका दहन-holika dahan date & time 2022 happy holi

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भद्रा मे होलिका दहन-holika dahan date & time 2022 happy holi

होलिका दहन ( holika dahan ) हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अनुसार सर्वदा फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को प्रदोष काल में भद्रा रहित मुहूर्त में करना चाहिए और यदि प्रदोष काल में भद्रा हो तो भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन ( holika dahan ) करना ठीक है क्योंकि भद्रा को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है।

वर्ष 2022 मे फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि 17 मार्च को दोपहर 01 बजकर 29 मिनट से प्रारंभ होकर 18 मार्च को दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगी ।

भद्रा काल 17 मार्च को दोपहर 01 बजकर 02 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा और ये 17 मार्च को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर होगा अर्थात 18 मार्च की तिथि तक भाद्र रहेगी । इस अनुसार होलिका दहन ( holika dahan ) का शुभ मुहूर्त 17 मार्च को रात 12 बजकर 57 मिनट के बाद से ही है।

भद्रा मे होलिका दहन ( holika dahan ) के विषय मे कुछ विद्वानो का मत है कि भद्रा की पूंछ में होलिका दहन ( holika dahan ) किया जा सकता है ।

अब जान लेते है भद्रा मुख और भद्रा पुंछ के समय को

भद्रा मुख और भद्रा पुंछ का समय

भद्रा पूँछ का समय 17 मार्च को रात्रि 09 बजकर 06 से लेकर 10 बजकर 16 तक रहेगा जबकि भद्रा मुख का समय 17 मार्च रात 10 बजकर 16 से लेकर रात्री 12 बजकर 13 तक ( अर्थात 00: 13 मिनट 18 मार्च ) तक है

यदि भद्रा मध्य रात्रि तक हो तो ऐसी स्थिति में भद्रा पूँछ के दौरान होलिका दहन ( holika dahan ) किया जा सकता है. किंतु ये ध्यान रहे कि भद्रा मुख में होलिका दहन ( holika dahan ) कदापि नहीं करना चाहिए.

किंतु 

काशी के विद्वानो के अनुसार ” होलिका दहन ( holika dahan ) किसी भी परिस्थिति मे भद्रा मे नही करना चाहिए

holika dahan होली holi 2022

होलिका दहन ( holika dahan ) की पूजा कैसे करें विधि

होलिका दहन ( holika dahan ) करने से पहले होलिका माई का पूजन किया जाता है।  होलिका दहन ( holika dahan ) वाले दिन सूर्योदय के समय उठकर स्नानदी से निवृत्त होकर होलिका दहन ( holika dahan ) वाले स्थान पर जा पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जायें और गाय के गोबर से होलिका और प्रहलाद की मूर्ति बना लें

इसके बाद जल अर्पित कर रोली, अक्षत ( चावल ) , फूल, बताशे, गुलाल, रंग, सात प्रकार के अनाज, गेहूं की बालियां, गन्ना, हल्दी, मूंग, चना आदि अर्पित कर दें और साथ ही भगवान नरसिंह की भी पूजा कर लें। इस पूजन के बाद कच्चे सूत ( धागे ) को होलिका की 5 ,7 या 11 बार परिक्रमा करते हुए लपेट दें।

होली का महत्व (Importance of holi )

भारत एक हिन्दू धर्म प्रधान देश  है , यहाँ की संस्कृति संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है और साथ ही हिन्दू धर्म संसार का प्राचीनतम और सनातन धर्म है जिसमे नित्य दिन कोई न कोई पर्व होता ही है |  

हिन्दू धर्म के सभी पर्व अपनी अपनी अनोखी संस्कृति से जुडाव के कारण पूरे संसार में प्रख्यात है और ऐसा ही एक पर्व है होली पर्व जिसे संसार के सभी भागो में धूमधाम से मनाया जाता है |    

होली पर्व आनंद का, उमंग का , मस्ती भरा पर्व है |जीवन के आनंद और उमंग के इस पर्व में हम सभी लोगों से गले मिलते है उनको रंग लगाते है और उनके रंगों में अपने आप को भी सराबोर कर लेते है | होली की मस्ती, आनंद सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है और इसीलिए होली का आनंद लेने विदेशों से भी अनेक पर्यटक वृन्दावन – मथुरा आकर होली का आनंद लेते है|

latthmar holi

राधा जी के गाँव बरसाना, कृष्ण जी के नंदगाँव की लट्ठमार होली , लड्डू और फूलों की होली भी पूरे संसार में प्रसिद्ध है |

होली को खूब मनाये और पूरी मस्ती से मनाये बस होली मानते समय हमें कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए|

जैसे सर्दियाँ समाप्त होते ही होली का पर्व आता है और मौसम में थोड़ी बहुत ठण्ड रहती है इसलिए यदि कोई व्यक्ति रोगी है या उसे रंगों से एलर्जी है तो ऐसे लोगो के साथ प्राकतिक गुलाल से ही होली खेलें,साथ ही ये ध्यान रखे की कोई भी पर्व खुशियों का होता है तो नशे में आकर तेज गति से गाड़ी न चलाये क्यूंकि यदि कोई दुर्घटना होती है तो पीड़ित आप हो या कोई और हो लेकिन उसके परिवार की खुशियाँ समाप्त हो जाती है|

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होली क्यों मनाई जाती है (history of holi festival)

(Holi story)

हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार प्राचीन समय में हिरन्यकश्यप नाम का एक राक्षस था जिसने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था जिससे संसार में कोई भी जीव , चाहे वो पशु हो, जलचर (जल में रहने वाला) हो, कोई पक्षी हो ,पुरुष हो ,स्त्री हो,राक्षस या देवता हो ,हिरन्यकश्यप का वध नही कर सकता है , साथ ही न दिन में न रात में ,न किसी अस्त्र या शस्त्र से , न आकाश में , न जल में , न थल पर हिरन्यकश्यप को कोई भी नही मार सकता है

ऐसा वरदान पाकर हिरन्यकश्यप को अपनी मृत्यु का कोई डर नही रहा जिससे वो निरंकुश हो गया और मानवों के साथ साथ देवताओं पर भी अत्याचार करने लगा, हिरन्यकश्यप के अत्याचार से सभी त्राहिमाम करने लगे, किन्तु ठीक इसके विपरीत हिरन्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद प्रभु विष्णु का परम भक्त था और भगवान् विष्णु की भक्ति में सदैव लीन रहता था|

चूँकि हिरन्यकश्यप को ये पता था कि उसे कोई मार नही सकता है इसलिए वो चाहता था की कोई भी भगवन विष्णु की पूजा न करे बल्कि हिरन्यकश्यप को ही भगवान् माने ,उसी की भक्ति करे किन्तु अपने पुत्र को ही अपनी आज्ञा के विपरीत जाते देख हिरनकश्यप ने प्रहलाद को मारने का आदेश दिया | जब अनेक उपाय करने पर भी हिरन्यकश्यप , प्रह्लाद को न मार सका तो अपनी बहन होलिका को ( जिसे अग्नि में भी कभी नही जलने का आशीर्वाद प्राप्त था ) को प्रह्लाद के वध का आदेश दिया |

होलिका अपने भाई के पुत्र प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठा कर प्रचंड अग्नि में ये सोच बैठ गयी कि उसे तो अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त है | ऐसा करने पर प्रभु विष्णु के आशीर्वाद से प्रह्लाद को तो कुछ भी नही हुआ लेकिन होलिका को मिला वरदान , वरदान के दुरुपयोग के कारण समाप्त हो गया और होलिका उसी अग्नि में समाप्त हो गयी |

इस घटना के पश्चात भी हिरन्यकश्यप में कोई भी सुधार नही हुआ बल्कि वो प्रह्लाद को और भी कष्ट देने लगा और जब प्रहलाद ने कहा कि प्रभु विष्णु संसार के कण कण में है तो हिरन्यकश्यप ने अपने महल में लगे एक स्तम्भ ( खम्बे ) को दिखाते हुए प्रह्लाद से पूछा कि क्या तेरा प्रभु इस स्तम्भ में भी है तो प्रह्लाद ने कहा कि हाँ इस स्तम्भ में भी भगवान् विष्णु है तब हिरन्यकश्यप ने गदा से उस स्तम्भ को तोडना चाहा

तब प्रभु विष्णु अपने नरसिंह अवतार में प्रकट हुए ,इस अवतार में प्रभु विष्णु – न पशु थे ,न पुरुष थे ,न स्त्री थे, और वो समय न दिन था,न रात थी ,न वो महल के अन्दर न बाहर थे,वो महल के द्वार के बीच में स्थित थे और इस अवस्था में भगवान् विष्णु ने हिरन्यकश्यप का वध किया और सभी को हिरन्यकश्यप के अत्याचार से मुक्ति प्रदान की |

भक्त प्रहलाद, हिरन्यकश्यप और होलिका से जुड़ी इसी घटना की स्मृति में आज पूरा संसार होली पर्व को धूमधाम से मनाता है|

maihindu.com की ओर से आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें 

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