माँ शारदा माई-मैहर देवी | maihar devi के बारे मे a 2 z information

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माँ शारदा माई-मैहर देवी | maihar devi के बारे मे a 2 z information

भारत के मध्य में स्थित मध्य प्रदेश राज्य के सतना जनपद में विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के मध्य पिरामिडाकार त्रिकूट पर्वत पर माँ शारदा यानि माँ सरस्वती का विश्व प्रसिद्द मंदिर है जिसे सभी मैहर देवी के नाम से जानते है |

माँ शारदा को मैहर देवी क्यों कहते है 

why maa sharda mai is known as maihar devi ?

एक मान्यता के अनुसार माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष के द्वारा करवाए जा रहे यज्ञ में अपने पति भगवान शिव को न बुलाये जाने से रुष्ट होकर यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए थे |

अपनी पत्नी सती की मृत्यु से क्रोधित हो भगवान शिव माता सती के शव को अपने कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य करने लगे | तांडव नृत्य से माता सती के शव से गले का हार त्रिकूट पर्वत के शिखर पर आ गिरा।

क्योंकि यहाँ माता सती का हार गिरा था इस कारण इस स्थान का नाम पहले माई का हार पड़ा था जो बाद में मैहर हो गया | माता सती का हार गिरने से इस स्थान का महत्व भी माता के अन्य शक्तिपीठों जैसा है ।

जबकि कुछ लोगों के अनुसार मैहर का अर्थ है माई का घर जोकि धीरे धीरे माई का घर से मैहर में बदल गया | 

मैहर देवी एक ऐसा सिद्ध मंदिर है जहा लाखो लोगो की मनोकामना पूर्ण हुई है और ऐसा कहा जाता है कि माँ शारदा का इससे बड़ा मंदिर और कही नही है , इसीलिए पूरे वर्ष यहाँ मैहर देवी के दर्शन की अभिलाषा लिए उनके भक्त दूर दूर से आते है |

मैहर देवी के दर्शन करने के लिए उनके भक्तों को पर्वत पर बनें 1063 सीढ़ियों पर चढ़ना पड़ता है। मैहर देवी मंदिर तक आप जाने के लिए रोपवे का भी इस्तेमाल कर सकते हैं|

मैहर देवी यानि माँ शारदा के इस मंदिर की खोज आल्हा उदल ने की थी ,उस समय मंदिर घने वन में था । आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक माँ शारदा की कठोर  तपस्या की थी , आल्हा  माँ शारदा को शारदा माई कहकर पुकारते थे इसीलिए आज भी माँ शारदा के अनेक भक्त माँ शारदा को शारदा माई के नाम से ही पुकारते है |

मैहर देवी के बारे में ये कहा जाता है कि सायंकाल माता की आरती होने के बाद जब मंदिर के कपाट बंद करके सभी पुजारी नीचे आ जाते हैं तब भी यहां मंदिर के भीतर से घंटी और पूजा करने की आवाज आती है । लोगों के अनुसार ये पूजा माँ शारदा माई के परम भक्त आल्हा ही करते है |

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माँ शारदा माई के परम भक्त आल्हा और उदल की कहानी

story of alha udal in hindi

राजा परमार के शासन में जगनिक नाम के एक कवि थे जोकि राजा परमार के राज कवि थे  | कवि जगनिक ने ही आल्हा खण्ड नाम के काव्य की रचना की थी | आल्हा और ऊदल बुन्देलखण्ड के महोबा के दो वीर योद्धा थे जोकि आपस में भाई थे, ये दोनों योद्धा राजा परमार के सामंत थे । आल्हा खंड में आल्हा और उदल दोनों भाईयों की शौर्य गाथा का भली भांति वर्णन किया गया है |

आल्हा खंड में इन दोनों भाहियों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है जिसमे आल्हा उदल की अंतिम लडाई पृथ्‍वीराज चौहान के साथ हुई  थी और चूँकि मां शारदा के परम भक्त आल्हा उदल को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था इसलिए पृथ्वीराज चौहान युद्ध में पराजित हुए थे किन्तु इसके पश्चात आल्हा के मन में वैराग्य आ गया और उन्होंने सांसारिक जीवन से संन्यास लेने का मन बना लिया।

अपने गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा उदल ने पृथ्वीराज को जीवित जाने दिया दिया था।

ऐसा कहा जाता है कि माँ शारदा के कहने पर आल्हा ने अपनी साग ( एक हथियार ) की नोक टेढ़ी करके माँ शारदा को समर्पित कर दी जिसकी नोक को अभी तक कोई सीधा न कर सका है |

क्या आल्हा उदल अमर है

are Alha Udal immortal?

आज भी ये आल्हा उदल मंदिर के कपाट खुलने से पहले ही मां के दर्शन कर लेते हैं। आल्हा और उदल माँ शारदा के आशीर्वाद से अमर है और यहाँ लगभग 900 वर्ष से निरंतर माता के भक्ति में लीन  है यानि आज भी जीवित है और इसका प्रमाण ये है कि पट खुलने पर मंदिर के फर्श पर जल व देवी पर फूल अर्पित हुए दिखते है। 

ऐसा कहा जाता है कि आल्हा उदल की भक्ति से प्रसन्न माँ शारदा यानि मैहर देवी ने आल्हा उदल को अमर होने और सदैव उनकी भक्ति में रहने का आशीर्वाद दिया इसलिए आल्हा उदल आज भी अमर है और प्रतिदिन माँ शारदा की प्रथम पूजा और आरती आल्हा और उदल ही करते है |

मैहर देवी मंदिर में आल्हा उदल के द्वारा माँ शारदा माई यानि मैहर देवी की प्रथम पूजा के अनेक साक्ष्य मिलते है जैसे आज भी रात 8 बजे मंदिर की आरती के बाद साफ-सफाई की जाती है और फिर मंदिर के सभी कपाट बंद कर दिए जाते हैं किन्तु इसके बाद भी जब मंदिर को दूसरे दिन ब्रहम मुहर्त में खोला जाता है तो माँ शारदा माई की पूजा हो चुकी होती है |

आल्हा अपनी शारदा माई का श्रृंगार और पूजन कर चुके होते है , मैहर देवी माँ शारदा माई के समक्ष पुष्प और जल पहले से ही चढ़े मिलते है |

आल्हा-ऊदल के नाम का बुंदेलखंड की धरती पर क्या महत्व है इसे आप इस प्रकार समझ सकते है कि  | बुंदेलखंड में आल्हा-ऊदल का नाम बड़े ही आदरभाव से लिया जाता है, यहाँ आल्हा उदल इतिहास के कण कण में है ।

अनेक बुन्देलखंडी कवियों ने आल्हा की शौर्यगाथा में अनेक कवितायेँ और गीत लिखे है जिन्हें बुन्देलखंडी समाज छोटे बड़े आयोजनों में जोर शोर से गया जाता है  | 

मैहर देवी के पास अन्य देवी देवता और स्थल 

मैहर देवी का ये  मंदिर त्रिकुट पर्वत की चोटी के मध्य भाग में स्थित है | मैहर देवी मंदिर के निकट काल भैरवी, काली माता , दुर्गा मां, गौरी शंकर, जलपा देवी,फूलमति माता, शेषनाग व ब्रह्म देव की भी पूजा की जाती है। इनके अतरिक्त मैहर देवी के निकट अन्य प्राचीन धरोहरें भी हैं ।

जैसे मंदिर के ठीक पीछे माँ शारदा माई यानि मैहर देवी के परम भक्त आल्हा- ऊदल के अखाड़े हैं तथा आल्हा का तालाब और भव्य मंदिर है जिसमें अमरता का वरदान प्राप्त हाथ में तलवार लिए आल्हा की विशाल प्रतिमा है। मंदिर से 2 किमी आगे एक आखाड़ा है जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा और उदल दोनों भाई कुश्ती किया करते थे।

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मैहर देवी मंदिर कब बना था ?When Maihar Devi Temple was Built ?

मैहर देवी मंदिर का इतिहास History of Maihar Devi Temple 

मैहर देवी के बारे में कहा जाता है कि माँ शारदा की प्रथम पूजा गुरु शुक्राचार्य ने की थी | जबकि मंदिर निर्माण के बारे में कहा गया है कि मंदिर की स्थापना 502 विक्रम संवत में हुई थी और माँ शारदा की मूर्ति की स्थापना 559 विक्रम संवत में हुई थी। वैसे मंदिर से जुड़े जो शिलालेख मिले है वो 9वीं व 10वीं सदी के है और इन शिलालेख पर जो लिपि लिखी है उसे आज तक कोई समझ नही सका है इसलिए मंदिर के निर्माण की पूरी जानकारी आज भी रहस्य बनी हुई है ।

मैहर देवी में कहाँ ठहरें ? Where to stay at Maihar Devi 

मैहर देवी एक बड़ा और महत्वपूर्ण तीर्थ है इसलिए यहाँ ठहरने की अच्छी व्यवस्था है | माँ शारदा माई के दर्शन के लिए स्थानीय भक्तों के साथ साथ दूर दराज से बड़ी संख्या में भक्त आते है इसीलिए यहाँ बड़ी संख्या में आश्रम , धर्मशालाएं और छोटे बड़े होटल है , जहाँ आप अपने बजट को देखते हुए ठहर सकते है |

कैसे पहुंचे मैहर देवी मंदिर ?

How to reach maihar devi temple

मैहर देवी मंदिर पहुंचने के कई विकल्प है। यहां रेल मार्ग, हवाई मार्ग व सड़क मार्ग से सभी प्रकार से पहुंचा जा सकता है |

वायुयान से मैहर देवी मंदिर कैसे जाएँ ?

how to reach maihar devi temple by flight ?

मैहर देवी मंदिर सतना जनपद में है जहाँ का निकटतम airport 140 किमी दूर खजुराहो airport (IATA: HJR, ICAO: VAKJ)  है  और दूसरा airport 160 किमी दूर जबलपुर airport (IATA: JLR, ICAO: VAJB) है, जिसे डुमना हवाई अड्डा भी कहा जाता है |

रेलगाड़ी से मैहर देवी मंदिर कैसे जाएँ ?

how to reach maihar devi temple by train ?

मैहर देवी मंदिर सतना जनपद में है जहाँ  रेलगाडी से आने के लिये आपको सतना जंक्शन रेलवे स्टेशन आना होगा (Satna Junction Railway Station code : STA) , सतना जंक्शन रेलवे स्टेशन भारत के प्रमुख स्टेशनों से जुड़ा हुआ है | मैहर देवी मंदिर से सतना जंक्शन रेलवे स्टेशन की दूरी मात्र 5 किमी है।

माता शारदा माई के अनेक भक्त तो सतना जंक्शन रेलवे स्टेशन उतर कर माँ शारदा के दर्शन के लिए पैदल ही चल देते है | वैसे सतना जंक्शन रेलवे स्टेशन से टेम्पो , टैक्सी मैहर देवी मंदिर के लिए निरंतर चलते रहते हैं | मां के दर्शन को यहां साल भर भक्तों की भीड़ रहती है।

सड़कमार्ग से मैहर देवी मंदिर कैसे जाएँ ?

how to reach maihar devi temple by road ?

मैहर देवी मंदिर सड़क मार्ग 7 एन एच (राष्ट्रीय राजमार्ग) से जुड़ा हुआ है। इसलिए देश के किसी भी भाग से मैहर देवी मंदिर सुगमता से पहुंचा जा सकता है |

प्राइवेट टैक्सी,local बस,निजी वाहन से हम मैहर देवी मंदिर बहुत ही सुगमता से पहुँच सकते है |

Remark :- यदि आप राहु से पीड़ित है तो माँ शारदा का पूजन अवश्य करे, आप की पीड़ा अवश्य दूर होगी |

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