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प्रभु नागेश्वर मंदिर,द्वारिका,गुजरात

प्रभु नागेश्वर नागों के ईश्वर है इसलिए यह मंदिर विष और विष से संबंधित रोगों से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर में भगवान शिव की ध्यान मुद्रा में एक बड़ी ही मनमोहक विशाल प्रतिमा है जिसकी कारण यह मंदिर बहुत दूर से ही दिखाई देने लगता है

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प्रभु नागेश्वर ज्योतिर्लिंग 

गुजरात राज्य के द्वारिका नगर से लगभग 16 किमी दूर
प्राकृतिक और शांत वातावरण में विराजित है प्रभु नागेश्वर | प्रभु नागेश्वर एक ऐसे
ज्योतिर्लिंग है जिनके बारे में अनेक मत है जैसे कुछ लोग उत्तराखंड के अल्मोड़ा के
निकट जोगेश्वर शिवलिंग को नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मानते है, वहीँ कुछ लोग  महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में और कुछ आंध्र
प्रदेश के पूर्णा के निकट लेकिन बहुमत से लोग गुजरात
राज्य के द्वारिका नगर के निकट स्थित ज्योतिलिंग को ही प्रभु नागेश्वर ज्योतिलिंग
मानते है और हम भी उन्ही के बारे में आपको बता रहें है शिव महापुराण के द्वादाश्ज्योतिर्लिंग स्तोत्रं के अनुसार भी नागेशं दारुकावने अर्थात
नागेश्वर जो द्वारका के निकट वन में
स्थित है|

इन्हें 12 ज्योतिलिंगो में
दसवे क्रम पर माना जाता है | प्रभु नागेश्वर नागों के ईश्वर है इसलिए यह मंदिर विष और विष से संबंधित रोगों से मुक्ति
के लिए प्रसिद्ध है। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर में भगवान शिव की ध्यान मुद्रा में एक बड़ी
ही मनमोहक  विशाल प्रतिमा है जिसकी कारण यह मंदिर बहुत दूर से ही
दिखाई देने लगता है, शिव जी की मूर्ति 125
फीट ऊँची तथा 25 फीट चौड़ी है पास ही पूजन सामग्री की छोटी छोटी दुकानें बनी हुई हैं और तनिक आगे ही तलघर नुमा गर्भगृह में श्री नागेश्वर
ज्योतिर्लिंग विराजित है | ज्योतिर्लिंग
के ऊपर एक चांदी का आवरण चढ़ा रहता है और चांदी
के नाग की आकृति बनी हुई है , ज्योतिर्लिंग
के पीछे माता पार्वती की मूर्ति स्थापित है|

यहाँ पर गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति मात्र उन्ही श्रद्धालुओं को होती है जो प्रभु नागेश्वर का अभिषेक करवाते हैं और गर्भगृह में जाने से पूर्व धोती पहननी पड़ती है | प्रभु नागेश्वर का अभिषेक सिर्फ गंगाजल
से ही होता है जोकि अभिषेक करने वाले भक्तों को मंदिर समिति की ओर से
निशुल्क मिलता है|

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पुराणों में प्रभु नागेश्वर
के बारे में एक कथा का वर्णन है जिसके अनुसार –

“ सुप्रिय नामक एक सदाचारी
वैश्य था। वह भगवान्‌ शिव का परम भक्त
था। वह शिव जी की पूजा –आराधना में मग्न रहता
था। उस वैश्य की भक्ति से दारुक नामक
एक राक्षस बहुत क्रोधित रहता था|

वह निरन्तर यह प्रयत्न करता था कि उस वैश्य सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुँचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने अवसर देखकर नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया। सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्यनियम के अनुसार भगवान्‌ शिव की पूजा-आराधना करने लगा। अन्य बंदी यात्रियों को भी वह शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के विषय में यह समाचार सुना तब वह अत्यन्त क्रोधित होकर कारागर में पहुंचा ।

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सुप्रिय उस समय भगवान्‌ शिव में ध्यान लगाए आँखें बंद किए बैठा था। उस राक्षस ने यह देखकर अत्यन्त क्रोधित स्वर में कहा- ‘अरे दुष्ट वैश्य! तू आँखें बंद कर इस समय यहाँ कौन- से उपद्रव और षड्यन्त्र करने की सोच रहा है ?’ उसके यह कहने पर भी धर्मात्मा शिवभक्त सुप्रिय विचलित नही हुए । यह देख दारुक राक्षस अत्यंत क्रोधित हो उठा । उसने तत्काल अपने अनुचरों को सुप्रिय तथा अन्य सभी बंदियों को मार डालने का आदेश दे दिया। तब भी सुप्रिय उसके इस आदेश से तनिक भी भयभीत नहीं हुआ।

वह अपनी और अन्य बंदियों की मुक्ति के लिए भगवान्‌
शिव से प्रार्थना करने लगा। उसे यह पूर्ण विश्वास था कि मेरे आराध्य भगवान्‌ शिवजी
इस संकट में अवश्य ही मेरी और अन्य बंदियों कि रक्षा करेंगे। उसकी
प्रार्थना सुनकर भगवान्‌ शिव उसी समय उस
कारागार में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए।

उन्होंने इस प्रकार सुप्रिय को दर्शन देकर उसे
अपना पाशुपत-अस्त्र भी प्रदान किया। इस अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उसके सहायक का
वध करके सुप्रिय शिवधाम को चला गया और इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा। “

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