How to get rid of debt a2z by Rin Mochan Mangal stotra |ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

Rin Mochan Mangal stotra ऋणमोचक मंगल स्तोत्र
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How to get rid of debt a2z by Rin Mochan Mangal stotra |ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

( How to get rid of debt by Rin Mochan Mangal stotra)

यदि आपके ऊपर सरकार का या किसी व्यक्ति का ऋण(कर्ज) बहुत अधिक हो गया है और अनेक प्रयासों के बाद भी ये ऋण(कर्ज) नही उतर पा रहा है तो आपको ऋणमोचक मंगल स्तोत्र(Rin Mochan Mangal stotra) का नियमित पाठ करना चाहिए, जब भी किसी कार्य में अपने द्वारा किये गये कार्य का परिणाम न मिल रहा हो तो कर्म के साथ साथ धर्म का आश्रय भी लेना ही चाहिए ।

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करने से निश्चित ही धीरे धीरे आपके ऊपर से ऋण(कर्ज) का बोझ उतर जाएगा।

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र(Rin Mochan Mangal stotra) का पाठ कैसे आरम्भ करे ??

(How to chant Rin Mochan Mangal stotra)

किसी भी शुभ तिथि से,जिस दिन मंगलवार भी हो, आप ऋणमोचक मंगल स्तोत्र(Rin Mochan Mangal stotra) का पाठ आरम्भ कर सकते है, ऐसा करने से पूर्व भद्रा, अशुभ चौघडिया इतियादी का ध्यान रखें।

शुद्ध वस्त्र पहनकर लाल वस्त्र के आसन पर प्रभु हनुमान जी को स्थापित कर और मंगल यन्त्र रखकर विधि विधान से उनका पूजनकर लाल बूंदी या लड्डू का भोग लगाकर ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ प्रारंभ करना चाहिए ।

आपनी शारीरिक सामर्थ्य और उपलब्ध समय के अनुसार ऋणमोचक मंगल स्तोत्र(Rin Mochan Mangal stotra) का पाठ 1,5 अथवा 11 बार 43 दिन तक प्रतिदिन करना चाहिए ।

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र के पाठ को नियमित करने से आपका कैसा भी ऋण(कर्ज) निश्चित शीघ्र उतर जायेगा या ऋण(कर्ज) को अपने ऊपर से उतारने का मार्ग प्राप्त हो जाएगा है।

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Rin Mochan Mangal stotra ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र| Rin Mochan Mangal stotra orignal

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 ||

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥

|| इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

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