दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र 31 Durga Saptashati Siddha Samput Mantra

दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र 31 Durga Saptashati Siddha Samput Mantra Chaitra navratri 2022 चैत्र नवरात्रि 2022
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दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र 31 Durga Saptashati Siddha Samput Mantra

31 Durga Saptashati Siddha Samput Mantra : दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र वे मंत्र हैं जिनके जाप से माँ दुर्गा प्रसन्न होकर अपने भक्तों को इच्छित फल प्राप्ति का अवसर देती है, दुर्गा सप्तशती के सिद्ध मंत्र के मंत्र विभिन्न प्रकार के होते है, जो कि हर एक इच्छाओ पर निर्भर करती है, और इन मंत्रो का कम से कम 11 , 21 , 51 अथवा 108 बार जाप करने से उस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण हो जाती है।

शुक्रवार का दिन आदि शक्ति दुर्गा माता (durga mata) का माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन यदि हम माँ दुर्गा ( maa durga ) को प्रसन्न करने के लिए विधि विधान से उनका पूजन करें ,  जिस भी प्रकार का प्रयास किया जाता हो वो सफल हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि कहा जाता इस दिन देवी मां अपने भक्तों पर अधिक प्रसन्न रहती हैं, जिसके चलते इनकी पूजा करने नाले जातकों के मन की हर इच्छा बहुत शीघ्र पूर्ण हो जाती हैं।

लेकिन कुछ लोगों को ये पता नही होता है किस मंत्र का जाप से किस कामना पूर्ती होगी 

आज इस पोस्ट में हम आपको  दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र (Durga Saptashati Siddha Samput Mantra)  बता रहें हैं जिनके जाप से आपकी  विभिन्न इच्छाओं या कामनाओं की पूर्ति होगी । जीवन में कितनी भी कठिनाई हो दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र के जाप से वो धीरे धीरे दूर होकर समाप्त हो जाती है , आइये जानते हैं दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र (Durga Saptashati Siddha Samput Mantra) 

दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र 31 Durga Saptashati Siddha Samput Mantra Chaitra navratri 2022 चैत्र नवरात्रि 2022

दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र (Durga Saptashati Siddha Samput Mantra)

–> 1. विपत्तिनाशक  

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति के लिये –

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्‍वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।

–> 2 . भय का नाश

1.सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

2. एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

3. ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥

–> 3. पापनाशक

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव॥

–> 4.रोगनाशक

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभिष्टान्।

त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥

–> 5 .महामारी नाश के लिये 

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

–> 6. आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिये 

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

–> 7. सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति के लिये 

पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

–> 8. इच्छित पति प्राप्ति के लिये

ॐ कात्यायनि महामाये महायेगिन्यधीश्वरि।

नन्दगोपसुते देवी पतिं मे कुरु ते नमः ॥

–> 9. बाधा शान्ति के लिये 

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

–> 10. सर्वविध अभ्युदय के लिये 

ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः।
धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥

–> 11. दारिद्र्यदुःखादिनाश के लिये –

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता॥

–> 12. रक्षापाने के लिये 

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥

–> 13. समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये –

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥

–> 14. सर्वकल्याण के लिए 

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

–> 15. शक्तिदायक 

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

–> 16. प्रसन्नतादायक 

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्‍वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव॥

–> 17. विविध उपद्रवों से बचने के लिये 

रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्‍च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्‍वम्॥

–> 18. बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादि की प्राप्ति के लिये 

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥

–> 19. भुक्ति मुक्ति की प्राप्ति के लिये 

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

–> 20. पापनाश तथा भक्ति की प्राप्ति के लिये –

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्‍‌या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

–> 21. पापों का नाश के लिये –

हिनस्ति दैत्येजंसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव ॥

–> 22. स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिये 

सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥

–> २३. स्वर्ग और मुक्ति के लिये –

सर्वस्य बुद्धिरुपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

–> 24. मोक्ष की प्राप्ति के लिये 

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्‍वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥

–> 25. स्वप्न में सिद्धि-असिद्धि जानने के लिये 

दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके।
मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय॥

–> 26. सामूहिक कल्याण के लिये 

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूत्‍‌र्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

–> 27. विश्‍व के अशुभ तथा भय का विनाश करने के लिये 

यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्‍च न हि वक्तुमलं बलं च।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥

–> 28. विश्‍व की रक्षा के लिये 

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्‍वम्॥

–> 29. विश्‍व के अभ्युदय के लिये 

विश्‍वेश्‍वरि त्वं परिपासि विश्‍वं विश्‍वात्मिका धारयसीति विश्‍वम्।
विश्‍वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्‍वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥

–> 30. विश्‍वव्यापी विपत्तियों के नाश के लिये 

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्‍वेश्‍वरि पाहि विश्‍वं त्वमीश्‍वरी देवि चराचरस्य॥

–> 31. विश्‍व के पाप-ताप-निवारण हेतु 

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्‍च महोपसर्गान्॥

durga ji ki arti

दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र (Durga Saptashati Siddha Samput Mantra) जाप विधि

नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। 

प्रातः स्नान आदि से निवृत हो एक शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष या तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पांच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। आसन पूर्व में भी प्रयोग कर चुके हों तो गंगाजल से पहले उसे पवित्र कर लें , 

नवरात्रि प्रतिदिन इन सिद्ध मन्त्रों के जाप से माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं।

साथियो अभी हमने दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र 31 Durga Saptashati Siddha Samput Mantra  को समझने का प्रयास किया , 

मित्रों इन दुर्गा सप्तशती सिद्ध मंत्र के निरंतर जाप से धीरे धीरे हमारे सारे कष्ट दूर होने लगते हैं 

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